जोहार हिंदुस्तान | डेस्क/नई दिल्ली: केरल की राजनीति में पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन का नाम एक बार फिर चर्चा में है। सक्रिय राजनीति में आने और चुनावी तैयारी करने के बावजूद वे चुनावी मैदान में नहीं उतर पाए। इसकी सबसे बड़ी वजह उनका लंबित इस्तीफा है, जो वर्षों बाद भी आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं हो सका है।
कन्नन गोपीनाथन वर्ष 2012 बैच के आईएएस अधिकारी रहे हैं और मूल रूप से कोट्टायम जिले के निवासी हैं। उनकी शिक्षा पालक्कड़ में हुई। वे दादरा और नगर हवेली में जिला कलेक्टर के पद पर भी कार्य कर चुके हैं और अपने कार्यकाल के दौरान एक सक्रिय व जनसंवेदनशील अधिकारी के रूप में पहचाने जाते रहे।
इस्तीफा बना सबसे बड़ी बाधा
वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर में लगाए गए प्रतिबंधों, विशेषकर संचार व्यवस्था पर रोक को लेकर उन्होंने असहमति जताई थी और इसी मुद्दे पर उन्होंने सेवा से इस्तीफा दे दिया था।
हालांकि, इस्तीफा देने के करीब 6.5 साल बाद भी इसे औपचारिक मंजूरी नहीं मिल सकी है। दरअसल, आईएएस अधिकारी का इस्तीफा एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरता है, जिसमें राज्य सरकार से लेकर भारत सरकार के कार्मिक विभाग (DoPT) तक अनुमोदन आवश्यक होता है। अंतिम स्वीकृति के बाद ही अधिकारी पूरी तरह सेवा से मुक्त माना जाता है।
“लाभ के पद” का नियम बना रोड़ा
भारतीय चुनावी नियमों के अनुसार, भारतीय संविधान के तहत कोई भी व्यक्ति “लाभ के पद” पर रहते हुए चुनाव नहीं लड़ सकता। चूंकि उनका इस्तीफा अभी लंबित है, इसलिए तकनीकी रूप से वे अब भी सरकारी सेवा से जुड़े माने जा सकते हैं। यही कारण है कि वे चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो गए।
कांग्रेस में शामिल होकर की थी तैयारी
राजनीति में सक्रिय होते हुए कन्नन गोपीनाथन ने वर्ष 2025 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ली थी। उन्हें एक शिक्षित, युवा और मुखर चेहरे के रूप में देखा जा रहा था और वे पालक्कड़ से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे।
हालांकि, परिस्थितियों को देखते हुए पार्टी ने वहां से मशहूर अभिनेता रमेश पिशारदी को उम्मीदवार बना दिया।
राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि उनका इस्तीफा समय पर स्वीकार हो जाता, तो वे चुनावी मैदान में एक मजबूत दावेदार बन सकते थे। यह मामला इस बात का भी उदाहरण बन गया है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी किस तरह किसी व्यक्ति के राजनीतिक करियर को प्रभावित कर सकती है।
अब आगे क्या?
अब नजर इस बात पर है कि उनका इस्तीफा कब तक स्वीकार होता है। यदि यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो भविष्य में कन्नन गोपीनाथन केरल की राजनीति में एक मजबूत और प्रभावशाली चेहरा बनकर उभर सकते हैं। यह मामला साफ तौर पर दिखाता है कि प्रशासनिक देरी लोकतांत्रिक भागीदारी पर भी असर डाल सकती है।