जोहार हिंदुस्तान | नई दिल्ली: ज़रा सोचिए… अगर किसी दिन पुलिस आपके दरवाज़े पर आए और कहे “आप बांग्लादेशी हैं, सामान समेटिए, आपको अभी डिपोर्ट किया जा रहा है।”
आप आधार कार्ड दिखाएं, राशन कार्ड दिखाएं, लेकिन पुलिस आपकी एक न सुने। आंख पर पट्टी बांधी जाए और बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के आपको सीमा पार छोड़ दिया जाए।
ऐसी भयावह घटना किसी की भी जिंदगी को कुछ ही पलों में उजाड़ सकती है। 26 साल की सुनाली खातून की जिंदगी इसी एक फरमान ने पूरी तरह बर्बाद कर दी।
गर्भवती सुनाली को न सिर्फ भारतीय होने के बावजूद डिपोर्ट कर दिया गया, बल्कि उनके साथ उनका 8 साल का छोटा बेटा भी इस नर्क जैसी यातना को झेलने पर मजबूर हो गया।
आधार–राशन कार्ड दिखाया, फिर भी डिपोर्ट कर दिया गया
सुनाली खातून ने पुलिस को आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य दस्तावेज़ दिखाए, लेकिन किसी अधिकारी ने उनकी एक नहीं सुनी।
बिना किसी जांच, बिना किसी नोटिस और बिना किसी कोर्ट ऑर्डर के उन्हें सीधे बांग्लादेश बॉर्डर पर छोड़ दिया गया।
एक गर्भवती महिला और उसके मासूम बच्चे के साथ इस तरह का व्यवहार मानवाधिकारों की सबसे बड़ी अवहेलना माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान, कहा – यह मानवीय संकट है
जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर और अमानवीय कृत्य माना।
3 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत सुनाली खातून को वापस भारत लाने का आदेश जारी किया।
सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को निर्देश दिया गया कि गर्भवती महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानवाधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
भारत लौटी सुनाली—पश्चिम बंगाल में इलाज जारी
अभी सुनाली खातून पश्चिम बंगाल में हैं और कुपोषण व स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का इलाज करा रही हैं।
लंबे समय तक खराब परिस्थिति में रहने के कारण उनके और उनके बच्चे के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा है।
बड़ा सवाल – दस्तावेज़ होते हुए भी कोई भारतीय कैसे हो सकता है डिपोर्ट?
यह मामला इस बड़े सवाल को जन्म देता है कि…
क्या सरकार की पहचान प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं?
क्या किसी भी भारतीय नागरिक को ऐसे ही “बांग्लादेशी” बताकर उठा लिया जा सकता है?
क्या गरीब और हाशिए पर मौजूद समुदायों को सबसे ज़्यादा निशाना बनाया जा रहा है?
मानवाधिकार कार्यकर्ता इस पूरी कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया का खुला उल्लंघन और नागरिक अधिकारों पर कठोर प्रहार बताते हैं।
वर्तमान स्थिति
सुनाली खातून फिलहाल सुरक्षित हैं, लेकिन इस घटना ने प्रशासनिक सिस्टम पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट आगे इस पूरे मामले पर विस्तृत सुनवाई करेगा।
