जोहार हिंदुस्तान | लोहरदगा: झारखंड राज्य आंदोलनकारियों ने अपनी ऐतिहासिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। लोहरदगा में आयोजित एक दिवसीय धरना में आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कहा कि “राज्य हमारे बलिदान से बना है, लेकिन आज वही आंदोलनकारी हाशिए पर हैं”। उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए नियमावली में संशोधन, जेल जाने की बाध्यता को समाप्त करने और आंदोलनकारियों को सम्मानित करने की मांग उठाई।
कार्यक्रम का मुख्य बिंदु
लोहरदगा समाहरणालय के समक्ष बुधवार को झारखंड आंदोलनकारी महासभा के तत्वावधान में 11 सूत्री मांगों को लेकर धरना आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिलाध्यक्ष अनिल कुमार भगत ने की, जबकि मुख्य संबोधन झारखंड आंदोलनकारी महासभा के केंद्रीय अध्यक्ष राजू महतो, प्रधान महासचिव कयूम खान और अन्य नेताओं ने किया।
मुख्य वक्ताओं के बयान
राजू महतो (केंद्रीय अध्यक्ष) ने कहा कि झारखंड आंदोलन के पुरोधाओं को सम्मानित किए बिना राज्य की आत्मा को सम्मान नहीं मिलेगा। सरकार तुरंत नियमावली में संशोधन करे और जेल जाने की बाध्यता समाप्त करे। यह न्याय का प्रश्न है, दया का नहीं।
कयूम खान (प्रधान महासचिव) ने कहा मुख्यमंत्री खुद आंदोलनकारी के पुत्र हैं। अब समय आ गया है कि वह इस पहचान का सम्मान करें और आंदोलनकारियों से वार्ता कर उनके अधिकार सुनिश्चित करें।
अनिल कुमार भगत (जिलाध्यक्ष) ने कहा झारखंड आंदोलनकारियों के त्याग से यह राज्य बना, लेकिन आज वही लोग उपेक्षित हैं। अगर सरकार ने समय रहते निर्णय नहीं लिया तो राज्यव्यापी आंदोलन तेज होगा।
धरना के दौरान रखी गई 11 सूत्री प्रमुख मांगें
1. झारखंड आंदोलनकारी कल्याण बोर्ड का गठन
2. आंदोलनकारी कॉरीडोर और स्मारक निर्माण
3. गुरुजी शिबू सोरेन सहित सभी आंदोलनकारियों को “झारखंड रत्न” सम्मान
4. जेल जाने की अनिवार्यता समाप्त कर एक समान श्रेणी
5. आंदोलनकारियों के लिए आवास नीति (आबुआ आवास की तर्ज पर)
6. सम्मान राशि 30,000 प्रति माह की जाए
7. सरकारी समितियों में 50% आंदोलनकारियों की भागीदारी
8. जिला स्तर पर आंदोलनकारी भवन व कॉन्फ्रेंस हॉल
9. आंदोलनकारी परिवारों को स्वरोजगार हेतु सरकारी अनुदान पर ऋण
10. सरकारी नौकरियों में आरक्षण 5% से बढ़ाकर 10%
11. आंदोलनकारियों की पहचान पत्र और स्थायी प्रमाणन की व्यवस्था
जवाबदेही और उम्मीद
धरना स्थल पर मौजूद आंदोलनकारियों ने कहा कि अब यह सिर्फ मांग नहीं, झारखंड की आत्मा और अस्मिता का प्रश्न है। उन्होंने सरकार को स्पष्ट संदेश दिया कि यदि जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो यह आंदोलन पूरे राज्य में जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
धरना के बाद प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त डॉ. ताराचंद के माध्यम से मुख्यमंत्री और राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा।
