जोहार हिंदुस्तान | नई दिल्ली : उन्नाव गैंगरेप मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सशर्त जमानत दिए जाने के बाद देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए न्याय व्यवस्था, सरकार और समाज तीनों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
राहुल गांधी ने कहा कि क्या एक गैंगरेप पीड़िता के साथ ऐसा व्यवहार उचित है? क्या उसकी “गलती” सिर्फ इतनी है कि वह न्याय के लिए आवाज़ उठाने की हिम्मत कर रही है? उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अपराधी को जमानत मिलना बेहद निराशाजनक और शर्मनाक है, खासकर तब जब पीड़िता को बार-बार प्रताड़ित किया गया हो और वह आज भी डर के साए में जीने को मजबूर है।
कांग्रेस नेता ने सवाल उठाया कि “बलात्कारियों को जमानत और पीड़िताओं के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार — ये कैसा न्याय है? साथ ही उन्होंने कहा कि यह मृत समाज की चेतावनी है। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य पीड़ित को सुरक्षा और भरोसा देना होता है, लेकिन यहां उल्टा देखने को मिल रहा है, जहां पीड़िता को ही संघर्ष, अपमान और असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है।
राहुल गांधी ने इस मुद्दे को केवल एक कानूनी मामला न मानते हुए इसे समाज के नैतिक पतन से जोड़ा। उन्होंने कहा कि देश सिर्फ आर्थिक संकट की ओर नहीं बढ़ रहा, बल्कि ऐसी घटनाओं के कारण हम एक अमानवीय और मृत समाज की ओर भी बढ़ते जा रहे हैं, जहां संवेदनाएं खत्म होती जा रही हैं और अन्याय सामान्य बनता जा रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ उठाना हर नागरिक का अधिकार है और उस आवाज़ को दबाना अपराध है। यदि कोई पीड़िता न्याय मांगने पर भी सुरक्षित नहीं है, तो यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल खड़ा करता है।
राहुल गांधी ने दो टूक कहा कि उन्नाव गैंगरेप पीड़िता को सम्मान, सुरक्षा और न्याय मिलना चाहिए, न कि बेबसी, भय और अन्याय। उन्होंने सरकार से अपील की कि पीड़िता की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और यह संदेश दिया जाए कि देश में कानून ताकतवरों के पक्ष में नहीं, बल्कि पीड़ितों के साथ खड़ा है।
गौरतलब है कि उन्नाव गैंगरेप पीड़िता पहले भी कई हमलों और धमकियों का सामना कर चुकी है। उसके परिवार के सदस्य भी हिंसा का शिकार हो चुके हैं, बावजूद इसके अपराधी को जमानत मिलना आम जनता के मन में न्याय व्यवस्था को लेकर गहरी चिंता पैदा कर रहा है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश की न्याय प्रणाली पीड़ितों को सच में सुरक्षा और भरोसा दे पा रही है, या ताकत और सत्ता के आगे न्याय कमजोर पड़ता जा रहा है।
