जोहार हिंदुस्तान | डेस्क/नई दिल्ली: 30 जनवरी 1948, भारत के इतिहास का वह दिन है जिसे देश कभी भुला नहीं सकता। यह वही दिन है जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नई दिल्ली के बिड़ला हाउस (अब गांधी स्मृति) में गोली मारकर हत्या कर दी गई। शाम लगभग 5 बजकर 17 मिनट पर नाथूराम विनायक गोडसे ने महात्मा गांधी पर तीन गोलियां दाग दीं, जिससे अहिंसा, सत्य और नैतिक साहस का सबसे बड़ा प्रतीक हमेशा के लिए खामोश हो गया।

महात्मा गांधी उस समय रोज़ की तरह शाम की प्रार्थना सभा में जा रहे थे। जैसे ही वे प्रार्थना स्थल पर पहुंचे, गोडसे उनके पास आया, झुककर प्रणाम किया और बेहद करीब से गोलियां चला दीं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, गोली लगने के बाद गांधी जी के मुख से अंतिम शब्द निकले—“हे राम।” कुछ ही क्षणों में भारत ने अपने राष्ट्रपिता को खो दिया।
महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उन्होंने सत्य और अहिंसा को केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन का आधार बनाया। दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ संघर्ष से लेकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन तक, गांधी जी ने बिना हथियार उठाए ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। दांडी मार्च, असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन जैसे ऐतिहासिक आंदोलनों ने उन्हें विश्व मंच पर नैतिक शक्ति का प्रतीक बना दिया।

आजादी के बाद भी गांधी जी का जीवन संघर्ष से भरा रहा। वे देश के विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा से बेहद व्यथित थे। हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए उन्होंने कई बार उपवास किया और हिंसा रोकने की कोशिश की। यही विचारधारा कुछ कट्टरपंथी ताकतों को अस्वीकार्य लगी। नाथूराम गोडसे और उसके सहयोगियों ने गांधी जी पर यह आरोप लगाया कि वे पाकिस्तान और अल्पसंख्यकों के प्रति नरम हैं।
गांधी हत्या के मामले में नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को दोषी ठहराया गया और 15 नवंबर 1949 को दोनों को फांसी दी गई। यह मुकदमा स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील केस माना जाता है।
महात्मा गांधी की शहादत ने देश को झकझोर दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश को संबोधित करते हुए कहा था—
“रोशनी हमारे जीवन से चली गई है और चारों ओर अंधेरा छा गया है।”
हर वर्ष 30 जनवरी को भारत में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन दो मिनट का मौन रखकर राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि दी जाती है। संयुक्त राष्ट्र ने भी गांधी जी की अहिंसा को वैश्विक शांति का आधार मानते हुए 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित किया है।

आज जब दुनिया युद्ध, नफरत और असहिष्णुता से जूझ रही है, महात्मा गांधी के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। उनकी शहादत यह याद दिलाती है कि हिंसा से सत्ता मिल सकती है, लेकिन स्थायी परिवर्तन केवल सत्य और अहिंसा से ही संभव है।
महात्मा गांधी भले ही 30 जनवरी 1948 को शहीद हो गए हों, लेकिन उनके विचार आज भी भारत की आत्मा और विश्व की चेतना में जीवित हैं।