जोहार हिंदुस्तान | पटना/बिहार: 1997 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी संजीव हंस एक बार फिर सुर्खियों में हैं। गैंगरेप, ब्लैकमेल, पद के दुरुपयोग, मनी लॉन्ड्रिंग और आय से अधिक संपत्ति जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद अक्टूबर 2025 में बिहार सरकार द्वारा उन्हें पुनः सेवा में बहाल कर बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (राजस्व परिषद) में अतिरिक्त सदस्य नियुक्त किया गया है। नियुक्ति की खबर वायरल होने के बाद बिहार सरकार का यह फैसला अब प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में बहस का विषय बन गया है।
क्या है आरोप
वर्ष 2023 में एक महिला वकील ने संजीव हंस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि उन्होंने अपने प्रभावशाली पद का दुरुपयोग कर उसके साथ यौन शोषण किया, ब्लैकमेल किया और मानसिक प्रताड़ना दी। शिकायत के अनुसार यह शोषण लंबे समय तक चला और पीड़िता को धमकाकर चुप रहने के लिए मजबूर किया गया।
इन आरोपों के सामने आने के बाद मामला केवल यौन अपराध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भ्रष्टाचार और अवैध संपत्ति की जांच भी शुरू हुई।
निलंबन और जांच
आरोप सामने आने के बाद बिहार सरकार ने संजीव हंस को निलंबित कर दिया। इसके साथ ही विशेष सतर्कता इकाई और अन्य जांच एजेंसियों ने उनकी संपत्ति और वित्तीय लेन-देन की पड़ताल शुरू की। जांच में सामने आया कि उनकी घोषित आय की तुलना में संपत्तियां कई गुना अधिक थीं।
ED की एंट्री और गिरफ्तारी
साल 2024 की शुरुआत में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत मामला दर्ज किया। अक्टूबर 2024 में ED ने संजीव हंस को गिरफ्तार किया। छापेमारी के दौरान बिहार, दिल्ली और अन्य राज्यों में फैली संपत्तियों का खुलासा हुआ।
जांच एजेंसी के अनुसार:
23 करोड़ से अधिक की अचल संपत्ति जब्त की गई, 11 करोड़ से अधिक नकद, निवेश और दस्तावेज मिले, फर्जी कंपनियों और बेनामी निवेश के सबूत सामने आए, संजीव हंस को न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जहां वे कई महीनों तक रहे।
जमानत लेकिन आरोप बरकरार
अक्टूबर 2025 में पटना हाईकोर्ट ने संजीव हंस को सशर्त जमानत दी। अदालत ने साफ कहा कि जमानत का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं है और जांच जारी रहेगी।
फिर बहाली, फिर सवाल
जमानत के कुछ ही समय बाद बिहार सरकार ने संजीव हंस का निलंबन समाप्त कर उन्हें बोर्ड ऑफ रेवेन्यू में अतिरिक्त सदस्य नियुक्त कर दिया। इस फैसले के बाद कई सवाल उठने लगे जैसे क्या गंभीर आरोपों के बावजूद इतनी अहम जिम्मेदारी देना उचित है? जब ED की जांच अभी भी जारी है, तब बहाली का क्या संदेश जाएगा? क्या इससे प्रशासनिक निष्पक्षता पर असर नहीं पड़ेगा?
वर्तमान स्थिति
संजीव हंस वर्तमान में सेवा में हैं ED और अन्य एजेंसियों की जांच अभी पूरी नहीं हुई है सभी मामले अदालत में लंबित हैं अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही आएगा।
कानूनी विशेषज्ञों की टिप्पणी
मामले पर कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि कानून के अनुसार, जमानत मिलना दोषमुक्ति नहीं होता। लेकिन एक अधिकारी पर लगे इतने गंभीर आरोपों के बीच उनकी दोबारा नियुक्ति ने सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
