जोहार हिंदुस्तान | पटना / कोलकाता: बिहार की राजनीति और प्रशासन से जुड़ी एक घटना ने न सिर्फ राज्य बल्कि देश-विदेश में भी बिहार और भारत की किरकिरी करा दी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान मुस्लिम महिला डॉक्टर नुसरत परवीन का हिजाब हटाने की घटना के बाद अब इसका मानवीय और सामाजिक असर सामने आने लगा है। इस घटना से आहत डॉक्टर नुसरत परवीन ने बिहार छोड़ दिया है और वह अपने परिवार के पास कोलकाता चली गई हैं।
15 दिसंबर की घटना के बाद लिया बड़ा फैसला
जानकारी के अनुसार यह घटना 15 दिसंबर 2025 को हुई थी। इसके ठीक अगले दिन यानी 16 दिसंबर को ही नुसरत परवीन बिहार से कोलकाता रवाना हो गईं। बताया जा रहा है कि इस घटना ने उन्हें मानसिक रूप से गहरा आघात पहुंचाया है। फिलहाल उन्होंने बिहार सरकार की नौकरी जॉइन न करने का फैसला लिया है।
डॉक्टर बनने का सपना, लेकिन डर और असुरक्षा का माहौल
नुसरत परवीन पढ़ाई में बेहद मेधावी रही हैं और डॉक्टर बनना उनका बचपन का सपना रहा है। उन्होंने कड़ी मेहनत से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की थी। परिवार के अनुसार, वह अपने पेशे को लेकर बेहद गंभीर थीं, लेकिन हालिया घटनाक्रम के बाद वे खुद को बिहार में सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही हैं।
परिजनों ने बताया कि परिवार लगातार उन्हें समझाने की कोशिश कर रहा है कि वह वापस बिहार लौटकर सरकारी सेवा जॉइन करें, लेकिन फिलहाल नुसरत मानसिक रूप से इसके लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि वे डर और असहजता के माहौल में काम नहीं कर पाएंगी।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों और विदेशी नेताओं की प्रतिक्रिया
यह मामला अब सिर्फ राज्य या देश तक सीमित नहीं रहा। एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि किसी महिला की धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत गरिमा के साथ इस तरह का व्यवहार मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
वहीं पाकिस्तान, मलेशिया, तुर्की सरकार ने भी इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया और भारत में अल्पसंख्यक महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं।
देश के भीतर भी बढ़ा विरोध
घटना के बाद देशभर में राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं। विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस और राजद, ने मुख्यमंत्री के व्यवहार को असंवेदनशील बताते हुए माफी की मांग की है। वही सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा लगातार ट्रेंड करता रहा।
फिल्म और सामाजिक जगत से जुड़ी हस्तियों ने भी प्रतिक्रिया दी है। पूर्व अभिनेत्री ज़ायरा वसीम सहित कई लोगों ने कहा कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को महिला की धार्मिक पहचान का सम्मान करना चाहिए।
सरकार की सफाई, लेकिन सवाल बरकरार
वहीं सत्तारूढ़ खेमे की ओर से यह कहकर बचाव किया गया कि मुख्यमंत्री का व्यवहार किसी गलत मंशा से नहीं था और इसे “पितृवत” भावना के रूप में देखा जाना चाहिए। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं और महिला अधिकार संगठनों का कहना है कि मंशा चाहे जो भी हो, सार्वजनिक मंच पर किसी महिला के हिजाब को हटाना अस्वीकार्य है।
सवाल जो अब भी कायम हैं
इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं क्या किसी महिला की धार्मिक पहचान से सार्वजनिक रूप से छेड़छाड़ स्वीकार्य है?क्या इस घटना का असर बिहार की महिला अधिकारियों और अल्पसंख्यकों के मनोबल पर पड़ेगा? क्या नुसरत परवीन जैसी प्रतिभाशाली डॉक्टर का बिहार छोड़ना राज्य के लिए नुकसान नहीं है?
फिलहाल नुसरत परवीन कोलकाता में अपने परिवार के साथ हैं और भविष्य को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। लेकिन यह घटना बिहार की राजनीति, प्रशासन और सामाजिक संवेदनशीलता पर एक गहरी बहस छोड़ गई है।
