जोहार हिंदुस्तान | लोहरदगा: लोहरदगा के कचहरी मोड़, दरहा देशवली स्थल पर रूढ़िजन्य जनजाति भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती, झारखंड राज्य स्थापना दिवस का 25वां वर्ष, तथा राष्ट्रीय सरना धर्म महासम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत भगवान बिरसा मुंडा के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ हुई।
कार्यक्रम का उद्घाटन लोहरदगा विधायक डॉ. रामेश्वर उरांव, पूर्व पंचायती राज विभाग निदेशक एवं आयकर आयुक्त, रांची निशा उरांव, महाराष्ट्र से प्रेम कुमार गोड़ाम, उड़ीसा से बालकृष्ण उरांव, बिहार–बंगाल–हो समाज से मुकेश विरूवा, रांची के राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा के गैना कच्छप सहित विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से किया। बड़ी संख्या में सरना समाज, राजी पड़हा के सदस्य और स्थानीय लोग उपस्थित थे।
ग्रामसभा कोर्ट-कचहरी से भी ज्यादा ताकत देती है” — निशा उरांव
अपने संबोधन में आयकर आयुक्त निशा उरांव ने कहा कि भारतीय संविधान ने स्पष्ट रूप से जनजातीय समाज को अपनी संस्कृति, परंपरा और धर्म की रक्षा करने का अधिकार दिया है।
उन्होंने कहा कि ग्राम सभा हमें कोर्ट-कचहरी से भी अधिक शक्ति देती है। जमीन–जायदाद, विवाद, शादी-विवाह, सामाजिक टकराव—इन सभी मामलों का समाधान सबसे पहले ग्राम सभा में होना चाहिए। यही हमारी मूल परंपरा है।
उन्होंने यह भी कहा कि जिन मुद्दों के लिए लोग बार-बार प्रशासन और सरकार की ओर देखते हैं, उनका हल समुदाय खुद ग्राम सभा की शक्ति से निकाल सकता है।
निशा उरांव ने चेताया कि आदिवासी समुदाय की जीविका, संस्कृति, जल–जंगल–जमीन गंभीर खतरे में हैं और इसके समाधान के लिए एकजुट उलगुलान की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया भगवान बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों और दिकुओं के अत्याचार के खिलाफ उलगुलान किया था। आज हमें परंपरा, संस्कृति और अधिकार बचाने के लिए वैसा ही सामाजिक उलगुलान करना होगा।”
उन्होंने कहा कि PESA कानून को अब ठंडे बक्से से निकालकर लागू किया जा रहा है, लेकिन इसकी सफलता भी ग्राम सभाओं की सक्रियता पर निर्भर करेगी।
कानून होते हुए भी आदिवासियों की जमीन नहीं बच पा रही” — डॉ. रामेश्वर उरांव
लोहरदगा विधायक डॉ. रामेश्वर उरांव ने कहा कि झारखंड में आदिवासी समाज की भूमि तेजी से बिक रही है, जबकि सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट जैसे सशक्त कानून मौजूद हैं।
उन्होंने कहा रांची में आज आदिवासी महज 23% बचे हैं। जमीन का लगातार गलत तरीके से हस्तांतरण हो रहा है। कानून होते हुए भी हम अपनी जमीन नहीं बचा पा रहे हैं, यह बहुत गंभीर स्थिति है।”
उन्होंने कानूनों की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि समाज को कानूनी जागरूकता और संगठन मजबूत करना होगा।
हमारी धरती ही हमारा धर्मग्रंथ है — मुकेश विरूवा
बिहार, बंगाल और हो समाज से आए प्रतिनिधि मुकेश विरूवा ने कहा कि आदिवासी समुदाय का धर्म किसी पुस्तक में नहीं, बल्कि धरती, प्रकृति और जीवन पद्धति में है।
उन्होंने कहा कि जल–जंगल–जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, हमारा धर्म है, हमारी पहचान है। बिरसा मुंडा भी प्रकृति से गहरे जुड़े थे, उन्हें जड़ी-बूटियों का विशेषज्ञ ज्ञान था।
उन्होंने बताया कि सरना धर्मस्थल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है, जो आदिवासी संस्कृति के वैश्विक सम्मान का संकेत है।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन
कार्यक्रम के अंत में विभिन्न जनजातीय समुदायों द्वारा पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर आकर्षक आदिवासी नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गईं, जिन्हें देखकर पूरा वातावरण उत्सवधर्मी हो उठा।
