जोहार हिंदुस्तान : भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल अंग्रेज़ी सत्ता के खिलाफ लड़ाई नहीं था, बल्कि यह आत्मसम्मान, न्याय और भारतीय अस्मिता की रक्षा की जंग थी। इस लड़ाई में अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता का अमृत दिया। ऐसे ही अमर सेनानी थे शहीद अशफ़ाकउल्ला ख़ान, जिन्होंने केवल स्वतंत्रता के लिए नहीं, बल्कि हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम करने के लिए भी अपना जीवन बलिदान कर दिया।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और बचपन की क्रांतिकारी चेतना
अशफ़ाकउल्ला ख़ान का जन्म पठान परिवार में हुआ, लेकिन उनके दिल में किसी धार्मिक भेदभाव की जगह नहीं थी। बचपन से ही वह रामप्रसाद बिस्मिल जैसे महान क्रांतिकारियों से प्रभावित हुए। देशप्रेम उनका धर्म था और आज़ादी उनका ईमान।
उन्होंने कहा..
मैं मुसलमान होकर भी अपने हिन्दू भाइयों के साथ आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा हूं। मेरे लिए सबसे बड़ा धर्म मेरा देश है।
अशफ़ाकउल्ला ख़ान
काकोरी कांड: अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिलाने वाला हमला
1925 में जब क्रांतिकारियों को हथियार खरीदने और आंदोलन चलाने के लिए धन की जरूरत हुई, तो अंग्रेजों के खजाने को लक्षित किया गया। यह प्रसिद्ध घटना काकोरी ट्रेन एक्शन के नाम से जानी जाती है।
इस ऑपरेशन के मुख्य योद्धा थे।
रामप्रसाद बिस्मिल (हिन्दू)
अशफ़ाकउल्ला ख़ान (मुस्लिम)
चंद्रशेखर आज़ाद, राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह आदि।
यह केवल एक डकैती नहीं थी, बल्कि एक क्रांतिकारी घोषणा थी कि भारत अब गुलामी सहन नहीं करेगा।
हिंदू-मुस्लिम एकता की अद्वितीय मिसाल
जब अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की नीति चलाई, उसी समय अशफ़ाक और बिस्मिल ने दुनिया को दिखा दिया कि भारत की असली ताकत उसकी साझा संस्कृति है।
बिस्मिल को रामायण और गीता प्रिय थीं
अशफ़ाक को कुरान और पैगंबर की शिक्षाएं
लेकिन दोनों ने एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करते हुए आज़ादी को सर्वोपरि माना। उनकी दोस्ती क्रांतिकारी नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक बन गई।
मुकद्दमा और फांसी की सजा
अंग्रेज सरकार ने काकोरी कांड को देशद्रोह बताकर अशफ़ाकउल्ला ख़ान को फांसी की सजा सुनाई।
लेकिन फांसी की सजा सुनते ही उन्होंने कहा मेरे दोनों पहलू मजबूत हैं – एक ओर मेरा ईमान, दूसरी ओर मेरा वतन। दोनों के लिए मेरी जान हाजिर है।”
19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में जब उन्हें फांसी के तख्ते पर ले जाया गया, तो उन्होंने कलमा पढ़ा, फिर कहा:
“हे भारत माता! तेरी राह में मेरा ये अंतिम प्रणाम। और मुस्कुराते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया।
अशफ़ाक की विरासत: जो आज भी जिंदा है
उन्होंने राष्ट्रवाद जाति और धर्म से ऊपर उठकर भारत की एकता को अपनी अंतिम सांस तक जिया। युवा प्रेरणा युवाओं को सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि बलिदान से प्रेरित किया, साहस का प्रतीक ब्रिटिश हुकूमत के सामने झुके नहीं, बल्कि सिर ऊंचा करके हंसते-हंसते बलिदान दिया। साझा संस्कृति गंगा-जमुनी तहज़ीब के सच्चे रखवाले और भारतीय एकता का अमर संदेश
आज क्यों ज़रूरी है अशफ़ाकउल्लाह खान को याद करना?
आज जब देश में विभाजनकारी ताकतें सक्रिय हैं, तब अशफ़ाक का जीवन हमें याद दिलाता है कि
✅ यह देश किसी एक धर्म का नहीं, सबका है
✅ हमारी ताकत हमारी एकजुटता में है
✅ स्वतंत्रता केवल इतिहास नहीं, हमारी पहचान है
अशफ़ाकउल्ला खान का जीवन केवल इतिहास नहीं, भारत की आत्मा की धड़कन है अशफ़ाकउल्ला खान ने साबित कर दिया कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि राष्ट्र की चेतना, मानवता, और सांझी विरासत की रक्षा का आंदोलन था। वे केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता के अमर दीपक थे, जो आज भी देश के युवाओं को रोशनी दिखा रहे हैं।
