जोहार हिंदुस्तान | कटक/उड़ीसा : करीब एक दशक से अधिक समय तक देशभर में चर्चा और विवाद का विषय रहे मौलाना अब्दुल रहमान कटकी को आखिरकार बड़ी कानूनी राहत मिल गई है। उड़ीसा के कटक स्थित विशेष सत्र अदालत ने आतंकवाद और प्रतिबंधित संगठन अल-कायदा से कथित संबंधों के मामले में उन्हें बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष मौलाना के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत और विश्वसनीय गवाह पेश नहीं कर सका।
इस फैसले के बाद एक बार फिर देश में मीडिया ट्रायल, जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और लंबे समय तक जेल में बंद रखे जाने जैसे गंभीर सवाल चर्चा में आ गए हैं।
विशेष सत्र न्यायाधीश मानस रंजन बारिक ने अपने फैसले में कहा कि कई अहम गवाह अदालत में अपने पुराने बयान से मुकर गए, जिससे अभियोजन पक्ष का पूरा मामला कमजोर पड़ गया। अदालत ने यह भी माना कि मौलाना अब्दुल रहमान कटकी के खिलाफ ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि वे किसी आतंकी गतिविधि में शामिल थे या युवाओं को भड़काने वाले भाषण दे रहे थे।
मीडिया ट्रायल पर फिर उठे सवाल
मौलाना अब्दुल रहमान कटकी का नाम सामने आते ही देश के कई टीवी चैनलों और मीडिया संस्थानों ने उन्हें वर्षों पहले ही “आतंकवादी” घोषित कर दिया था। लगातार टीवी डिबेट, सनसनीखेज रिपोर्टिंग और एकतरफा प्रस्तुति के जरिए उनकी छवि को कठघरे में खड़ा किया गया।
अब अदालत के फैसले के बाद यह सवाल उठ रहा है कि बिना अंतिम न्यायिक निर्णय के किसी व्यक्ति को दोषी की तरह पेश करना क्या न्याय व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ नहीं है। सामाजिक और कानूनी जानकारों का मानना है कि इस तरह के मामलों में मीडिया ट्रायल किसी व्यक्ति और उसके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा नुकसान पहुंचाता है।
14 वर्षों तक जेल में रहे मौलाना
मौलाना अब्दुल रहमान कटकी पिछले लगभग 14 वर्षों से विभिन्न मामलों में जेल में बंद रहे। बताया गया कि दिल्ली, जमशेदपुर और कटक में उनके खिलाफ अलग-अलग मामले दर्ज किए गए थे। दिल्ली के एक मामले में उन्हें साढ़े सात वर्ष की सजा हुई थी, जिसे वे पूरा कर चुके हैं। वहीं जमशेदपुर मामले में वे पहले ही बरी हो चुके थे। अब कटक अदालत से भी राहत मिलने के बाद उनकी रिहाई का रास्ता साफ हो गया है।
मौलाना हलीमुल्लाह कासमी ने अदालत के फैसले को “सच्चाई और इंसाफ की जीत” बताते हुए कहा कि लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार न्याय मिला है। उन्होंने कहा कि एक बेगुनाह व्यक्ति ने अपने जीवन के 14 साल जेल में गुजार दिए, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद तेज हुई सुनवाई
जानकारी के अनुसार पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को दो महीने के भीतर मामले की सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था। इसके बाद सुनवाई में तेजी आई और अब अदालत ने अंतिम फैसला सुनाते हुए मौलाना को बरी कर दिया।
यह मामला पिछले कई वर्षों से कानूनी और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ था। अदालत के फैसले के बाद अब एक बार फिर देश में न्याय प्रक्रिया, मीडिया की भूमिका और आतंकवाद से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियों की जवाबदेही पर बहस तेज हो गई है।