जोहार हिंदुस्तान | स्पेशल रिपोर्ट, लोहरदगा/झारखंड: आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकलकर साइकिल के सहारे देश-दुनिया के सफर पर निकलीं पर्वतारोही और एडवेंचर एथलीट समीरा खान आज केवल रोमांच की पहचान नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की बेटियों के अधिकारों की सशक्त आवाज बन चुकी हैं। 37 देशों और भारत के दर्जनों राज्यों में 7,000 किलोमीटर से अधिक की साइकिल यात्रा, कई पर्वत शिखरों पर तिरंगा फहराने का गौरव और गांव-गांव जाकर बालिकाओं से संवाद उनकी यात्रा को एक सामाजिक आंदोलन का रूप देता है।
फिलहाल बिहार होते हुए झारखंड पहुंचीं समीरा खान सोमवार को लोहरदगा पहुंचीं, जहां उन्होंने लोहरदगा उपायुक्त डॉ. कुमार ताराचंद से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने अपने अभियान की जानकारी साझा करते हुए ग्रामीण बालिकाओं के अधिकार, सुरक्षा और सशक्तिकरण को लेकर विस्तार से चर्चा की। समीरा ने बताया कि कैसे एक छोटे से गांव से निकलकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई और आज वे अपनी साइकिल यात्रा के माध्यम से ग्रामीण भारत की बेटियों को आत्मसम्मान, स्वतंत्र सोच और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने का कार्य कर रही हैं।
समीरा खान का मानना है कि असली बदलाव शहरों से नहीं, बल्कि गांवों से शुरू होता है, जहां आज भी लड़कियों को पितृसत्तात्मक सोच, सामाजिक बंदिशों और भेदभाव का सबसे अधिक सामना करना पड़ता है। लोहरदगा प्रवास के दौरान वे यहां की बालिकाओं और युवतियों से संवाद कर अपने अनुभव साझा करेंगी और उन्हें शिक्षा, आत्मनिर्भरता और अपने फैसले खुद लेने के लिए प्रेरित करेंगी।
वर्ष 2018 में पर्वतारोहण से जुड़ने के बाद समीरा खान ने हर साल अपना एक महीना पूरी तरह ग्रामीण स्कूलों और गांवों की लड़कियों को समर्पित करने का संकल्प लिया। वे स्कूलों में जाकर बच्चियों से सीधा संवाद करती हैं और उन्हें आगे बढ़ने का आत्मविश्वास देती हैं। यही पहल आगे चलकर एक संगठित अभियान बन गई, जिसे वे ग्रामीण बालिका सशक्तिकरण से जोड़कर देखती हैं।
मानवशास्त्र (एंथ्रोपोलॉजी) की पढ़ाई कर चुकी समीरा ने अपनी यात्राओं के दौरान अलग-अलग देशों और समाजों में लड़कियों की सामाजिक स्थिति, संस्कृति और जीवन-शैली का गहराई से अध्ययन किया है। दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, मध्य एशिया और यूरोप की यात्राओं के अनुभवों ने उन्हें यह समझ दी कि समाज चाहे अलग हों, लेकिन लड़कियों के संघर्ष लगभग समान हैं।
भारत में उनकी साइकिल यात्रा आंध्र प्रदेश से शुरू होकर कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, नेपाल, बिहार और अब झारखंड तक पहुंच चुकी है। इस दौरान उन्होंने पाया कि आज भी कई ग्रामीण इलाकों में लड़कियों को मोबाइल, इंटरनेट और स्वतंत्र निर्णय लेने की आजादी नहीं मिल पाती।
समीरा खान का स्पष्ट संदेश है कि लड़कियां केवल लड़की नहीं, बल्कि सबसे पहले इंसान हैं। उन्हें सोचने, चुनने और अपने सपनों को जीने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। जब तक वे आत्मनिर्भर नहीं हो जातीं, तब तक समाज को उन्हें वही समर्थन देना चाहिए जो सहज रूप से लड़कों को दिया जाता है। साइकिल की हर पैडलिंग, हर चढ़ाई और हर गांव की चौपाल पर की गई बातचीत के साथ समीरा खान यह साबित कर रही हैं कि बदलाव के लिए बड़े मंच या भारी संसाधन नहीं, बल्कि संकल्प, साहस और सही दिशा की जरूरत होती है। ग्रामीण भारत की बेटियों के लिए उनकी यह यात्रा एक मजबूत उम्मीद बनकर सामने खड़ी है।