जोहार हिंदुस्तान | लोहरदगा/झारखंड: 6 दिसंबर को मुस्लिम यूथ वेलफेयर सोसाइटी की ओर से बाबरी मस्जिद शहादत दिवस मनाया गया। संगठन के संस्थापक सैयद वसीम और अध्यक्ष अब्दुल मोहेमीन उर्फ बब्बन के नेतृत्व में अमला टोली चौक पर समुदाय के लोगों ने एकत्र होकर उपस्थित लोगों को काला बिल्ला लगाकर घटना के प्रति अपनी भावनात्मक संवेदनाएँ व्यक्त कीं और इसे देश के साम्प्रदायिक इतिहास में दर्ज एक अत्यंत दुखद घटना बताया।
अध्यक्ष अब्दुल मोहेमीन उर्फ़ बब्बन का विस्तृत बयान
सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल मोहेमीन उर्फ़ बब्बन ने कहा कि 6 दिसंबर का दिन मुस्लिम समाज के लिए बेहद दुख और पीड़ा का दिन है। बाबरी मस्जिद की शहादत को उन्होंने भारतीय मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़ा मुद्दा बताते हुए कहा कि इस घटना ने दशकों से समुदाय के दिलों में एक दर्द छोड़ दिया है।
उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना सिर्फ एक ढांचे का गिरना नहीं था, बल्कि यह हमारे समुदाय के लिए नाइंसाफी और गहरी तकलीफ का प्रतीक बन गया। आज भी लोग उन पलों को याद करके दुखी होते हैं। हम किसी से नफरत या तनाव नहीं चाहते, लेकिन हमारा दर्द और हमारी भावनाएं भी उतनी ही सच हैं। मुसलमानों के साथ कई बार भेदभाव हुआ है, उनकी बातों को नजरअंदाज किया गया है, लेकिन हम हमेशा संविधान पर भरोसा रखते आए हैं और आगे भी रखते रहेंगे।
उन्होंने आगे कहा कि समाज का हर वर्ग यह समझे कि देश की मजबूती आपसी सम्मान, न्याय और बराबरी से ही आती है। किसी भी समुदाय को उसके धर्म या पहचान के आधार पर हाशिये पर नहीं धकेला जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद के मामले में न्यायिक निर्णय को हमने शांति बनाए रखने की भावना के साथ स्वीकार किया, लेकिन यह भी सच है कि बहुत से मुसलमान आज भी इस घटना को एक ऐतिहासिक पीड़ा के रूप में याद करते हैं।
शांतिपूर्ण और संयमित कार्यक्रम
कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण और संयमित माहौल में पूरा हुआ। आयोजकों ने यह सुनिश्चित किया कि किसी तरह की अशांति या उत्तेजना फैलने की गुंजाइश न रहे।
मौके पर सैयद वसीम ने कहा कि शहादत दिवस मनाने का उद्देश्य किसी समुदाय के प्रति विरोध प्रकट करना नहीं है, बल्कि लोगों को न्याय, समानता और संविधान की मूल भावना की याद दिलाना है।
उन्होंने कहा कि 1992 की घटना ने देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब को गहरी चोट पहुंचाई थी, और इसे केवल दुख के रूप में याद किया जाता रहेगा।
