जोहार हिंदुस्तान | पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी कमजोरियों और नेतृत्व की विफलताओं को फिर एक बार उजागर कर दिया है।
बिहार में जहाँ असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने 5 सीटें जीतकर सीमांचल में मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई, वहीं कांग्रेस — राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी — सिर्फ 6 सीटों पर सिमट गई।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में इस हार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष इमरान प्रतापगढ़ी पर आती है।
क्यों कांग्रेस की हार का ठीकरा इमरान प्रतापगढ़ी पर फूट रहा है?
1. इमरान प्रतापगढ़ी की ज़मीन से दूरी, सोशल मीडिया पर सक्रियता ज़्यादा, कांग्रेस समर्थकों में यह शिकायत आम है कि इमरान चुनावी मैदान में कम और फोटोग्राफी, सोशल मीडिया व शेरो-शायरी में ज़्यादा दिखे।
इलाके के कई कार्यकर्ताओं ने बताया कि इमरान प्रतापगढ़ी चुनाव प्रचार में सिर्फ भीड़ खींचने वाले कलाकार की भूमिका निभाते हैं, नेता की नहीं।
AIMIM बूथ लेवल पर मजबूत थी, जबकि कांग्रेस का पूरा दारोमदार इमरान जैसे ‘स्टार चेहरे’ पर टिका रहा — और खेल बिगड़ गया।
2. असदुद्दीन ओवैसी पर ‘बिना मतलब’ का हमला – उल्टा पड़ा दांव
इमरान ने चुनाव के दौरान ओवैसी को “भाजपा का दलाल” और “दरी बिछाने वाला” कहा लेकिन यह बयान बिना किसी तथ्य के दिया गया, जिसका नतीजा यह निकला कि
✔ मुस्लिम वोटर उल्टे कांग्रेस से नाराज़ हो गए
✔ ओवैसी की सहानुभूति बढ़ी
✔ कांग्रेस की साख कमजोर पड़ी
मुस्लिम समुदाय में यह सवाल गूंजा कि जिस नेता ने कभी हमारे मुद्दों पर संघर्ष नहीं किया, वह असदुद्दीन ओवैसी जैसे लड़ने वाले नेता को कैसे बदनाम कर सकता है?
3. कांग्रेस को सीट नहीं दिला सके — उल्टा नुकसान कराया
इमरान प्रतापगढ़ी कांग्रेस के राज्यसभा सांसद भी हैं और अल्पसंख्यक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भीलेकिन आज तक उन्होंने
✔ न उन्होंने कोई विधानसभा सीट जिताई
✔ न वे किसी प्रदेश में मुस्लिम वोटों को एकजुट कर पाए
✔ न उन्होंने अल्पसंख्यक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर मजबूत आवाज उठाई
कई विश्लेषकों का मानना है कि इमरान के पद बड़े हैं, लेकिन प्रदर्शन बेहद छोटा।
4. सीमांचल—जहाँ कांग्रेस कभी मजबूत थी, आज खाली हाथ क्यों?
सीमांचल में कांग्रेस के पास मजबूत संगठन नहीं है और कोई स्थानीय नेतृत्व नहीं है और न ही निरंतर जनसंपर्क अभियान है चुनाव से 6–8 महीने पहले तक कांग्रेस ने कोई जमीन तैयार नहीं की।
वहीं AIMIM ने
✔ घर–घर प्रचार
✔ सामुदायिक मीटिंग
✔ स्थानीय मुद्दों पर आंदोलन
✔ कानूनी सहायता
सब चलाए।
परिणाम– AIMIM 5 सीट जीत गई, कांग्रेस संघर्ष में भी नहीं दिखी।
5. “इमरान की चुप्पी” बनाम “ओवैसी की लड़ाई” – समुदाय का साफ झुकाव
जब-जब देश में
– CAA–NRC
– बुलडोज़र कार्रवाई
– मॉब लिंचिंग
– दलित–अल्पसंख्यक हिंसा
जैसे मुद्दे उठे, तब
✔ ओवैसी संसद में लड़े
✔ कानूनी मदद पहुंचाई
✔ सड़क पर उतरे
वहीं इमरान प्रतापगढ़ी —
✔ चुप रहे
✔ ट्वीट तक सीमित रहे
✔ या शेरो–शायरी कार्यक्रमों में व्यस्त रहे
इस असमान तुलना ने मुस्लिम वोटर को साफ सिग्नल दिया कि कांग्रेस का अल्पसंख्यक नेतृत्व संघर्षशील नहीं, सिर्फ दिखावटी है।
6. कांग्रेस हाईकमान की बड़ी गलती? गलत व्यक्ति को गलत जिम्मेदारी
कांग्रेस ने इमरान को बड़ी जिम्मेदारी दी, लेकिन
– वे संगठन नहीं चला पाए
– न रणनीति बना पाए
– न समुदाय का विश्वास जीत पाए
– न स्थानीय नेतृत्व को तैयार कर पाए
इससे चुनाव में अराजक तैयारी दिखाई दी। अंततः बिहार में कांग्रेस की हार का बड़ा कारण बना कुशल नेतृत्व का अभाव — जिसका चेहरा इमरान प्रतापगढ़ी हैं।
क्या यह हार कांग्रेस के लिए चेतावनी है?
हाँ, अगर कांग्रेस अल्पसंख्यक समुदाय को फिर से जोड़ना चाहती है तो
✔ शो-मैनशिप से आगे बढ़कर
✔ असली नेतृत्व
✔ असली मुद्दों की लड़ाई
✔ और ग्राउंड प्रेज़ेंस
ज़रूरी है। वर्ना आने वाले राज्यों में AIMIM या अन्य क्षेत्रीय दल कांग्रेस का पूरा वोट बैंक खींच सकते हैं।
