जोहार हिंदुस्तान | पटना : जब राजनीति चमचमाती गाड़ियों, करोड़ों की संपत्ति और बाहुबल की होड़ में फंसी हो, तब बिहार के बलरामपुर से चार बार विधायक बने CPI(ML) नेता महबूब आलम एक ऐसी मिसाल बनकर उभरते हैं जो जनता को याद दिलाती है — “राजनीति सेवा है, सत्ता नहीं।”
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने पूरे राज्य में सबसे बड़ी जीत हासिल की और सबसे कम संपत्ति घोषित कर यह साबित कर दिया कि जनता का भरोसा धनबल और बाहुबल से नहीं, चरित्र और संघर्ष से जीता जाता है।
सादगी की मिसाल (तथ्यात्मक आंकड़े)
चुनाव 2020 हलफनामा: संपत्ति मात्र 70,000 नकद और कोई व्यक्तिगत वाहन नहीं
सरकारी बंगला ठुकराया, आज भी गांव के एक साधारण कच्चे घर में रहते हैं
सुरक्षा का काफिला नहीं, खुद साइकिल या मोटरसाइकिल से जनता के बीच
पटना में भी टेंपू में सफर करते दिखते हैं
ना आलीशान ऑफिस, ना AC रूम – जनता के बीच बैठकर समस्याएं सुनते हैं
जब नेता सत्ता मिलते ही लक्ज़री कारों का काफिला खड़ा कर लेते हैं, महबूब आलम खुद कहते हैं — “मैं विधायक नहीं, जनता का नौकर हूं।”
संघर्ष की गाथा – छात्र आंदोलन से विधानसभा तक
गरीबी में जन्म, पिता मजदूर थे। पढ़ाई के साथ खेतों और ईंट-भट्ठे में मजदूरी करनी पड़ी
छात्रकाल से ही जमींदारों और माफिया के खिलाफ संघर्ष शुरू किया
CPI(ML) के किसान आंदोलनों में हिस्सा लिया, भूमि अधिग्रहण, मजदूरी बकाया और दलित उत्पीड़न के खिलाफ सड़क से सदन तक लड़ाई लड़ी
कई बार गिरफ्तार हुए, जेल भी जाना पड़ा – लेकिन जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और बढ़ती गई
भ्रष्ट व्यवस्था के सामने सीधी टक्कर
विधानसभा में भ्रष्ट अधिकारियों, दलाल नेटवर्क और सांप्रदायिक राजनीति पर खुलकर हमला, कई मौकों पर सरकारी अफसरों को सदन में कटघरे में खड़ा किया
“किसानों की फसल लूटी जाएगी तो MLA महबूब आलम सड़क पर उतर जाएगा, चाहे सरकार किसी की भी हो” – उनका यह बयान वायरल हुआ था
ऐतिहासिक चुनावी रिकॉर्ड
वर्ष जीत का अंतर मुख्य प्रतिद्वंदी खास बात
2005 पहली बार विजयी RJD उम्मीदवार गरीबों की ज़मीन बचाने का आंदोलन प्रमुख कारण
2010 जीत दोबारा लोकसभा सांसद के रिश्तेदार को हराया जनता ने “पैसे vs संघर्ष” में संघर्ष को चुना
2015 मामूली अंतर से हारे लेकिन वोट प्रतिशत बढ़ा NDA प्रत्याशी विपक्ष में रहते हुए भी जनआंदोलन कायम
2020 सबसे बड़ी जीत JDU उम्मीदवार बिहार में सबसे कम संपत्ति और सबसे अधिक जीत का रिकॉर्ड
➡ 2020 में उन्होंने 52% से ज्यादा वोट लेकर रिकार्ड बनाया
➡ यह बिहार विधानसभा चुनाव का सबसे उच्च जीत मार्जिन था
जनता की मदद के उदाहरण
एक किसान के बेटे की हत्या के खिलाफ FIR दर्ज कराने तक पुलिस तैयार नहीं थी, महबूब आलम खुद थाने में धरने पर बैठ गए
एक मजदूर परिवार के बच्चों को पढ़ाने के लिए खुद अपने MLA फंड से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत मजदूरी कर पैसे जुटाए
कोरोना काल में जब नेता गायब थे, महबूब आलम खुद दवा और राशन लेकर गांवों में घूमते रहे
उनके समर्थक कहते हैं – “आलम साहब MLA नहीं, इंसानियत का चेहरा हैं।”
चुनावी असर और भविष्य की राजनीति
आज महबूब आलम सिर्फ एक विधायक नहीं, वैकल्पिक राजनीति का चेहरा बन चुका है। दलित, गरीब, मुसलमान, पिछड़े और किसान वर्ग उन्हें अपनी आवाज मानते हैं
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर बिहार में वैकल्पिक सरकार बनी तो महबूब आलम उसका सबसे प्रबल चेहरा हो सकते हैं
